चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
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मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा:परंपरा बनाम नवीनता
स्त्री बदलना चाहती है। वह बदलाव की आकांक्षा लेकर नवीन निर्माण चाहती है।। यहाँ बदलाव का अर्थ है - नए रूप में परंपरा को रखना, उसे मनुष्य विरोधी होने से बदलकर मनुष्य के लिए सार्थक और सकारात्मक बनाना। लेखिका का मानना है कि समय के साथ परंपराओं में बदलाव आना आवश्यक ही नहीं, वरन् महत्त्वपूर्ण भी है। समय वही नहीं रहता, जो प्राचीन या मध्ययुग में था। समय वह भी नहीं रहेगा, जिसे हम आधुनिक समाज कहते हैं। परंपरा की नियमावली अगर परिवर्तित नहीं होगी, तो रूढ़ हो जाएगी। जैसे - पानी अगर बहता नहीं है तो सड़ने लगता है। रूढ़ियाँ मनुष्य जीवन के लिए कभी भी सकारात्मक और भविष्योन्मुखी नहीं होती। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा इस दृष्टि से एक नयी इबारत गढ़ने की सार्थक कोशिश के रूप में हमारे सामने आती है। शिक्षा से लेकर रीति-रिवाजों के नवीनीकरण तक का प्रबल आग्रह हमें आत्मकथा में देखने को मिलता है।मैत्रेयी पुष्पा
चित्रांकन
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मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में जो महत्त्वपूर्ण बात देखने को मिलती है, वह यह है कि लेखिका पुरानी परंपराओं को तोड़कर निर्माण की आकांक्षा नहीं करती। उनकी नजर में तो परंपरा पुरानी भी हो सकती है और नयी भी; बशर्ते पुरानी परंपरा में नई बातें, नयी विधियाँ - प्रविधियाँ शामिल हों। परंपरा में नया रूप जोड़कर उसे सर्वथा नूतन और नवीन रूप प्रदान करना ही लेखिका का उद्देश्य रहा है। पुरुष सत्ता की सामंती व्यवस्था को बदलने का लेखिका का जो सपना है, वह अंत तक आते-आते अपना साकार रूप लेने लगता है और यहाँ सहभागिता का सकारात्मक और मिला-जुला रूप उपस्थित हो उठता है। लेखिका अपनी जमीन पर खड़ी होकर अपनी लड़ाई लड़ती है। उस जमीन को वह एक पल के लिए भी नहीं छोड़ती।
मैत्रेयी पुष्पा
एक ओर परंपरागत रीति-रिवाजों और शोषण से उबरने की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर आत्मनिर्भरता और स्वावलंबी चेतना
का प्रबल समर्थन भी करती हैं। आत्मकथा के माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा विवाह संबंधी
परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ने की पुरजोर कोशिश करती हैं। पति-पत्नी के बीच असमानता की
खाई को समाप्त कर समान अधिकार और समान कर्तव्यों के हक के लिए लेखिका समाज की
पुरुषवादी मानसिकता से लड़ने का साहस भी करती है। वह चीख-चीख कर कहती है कि नारी
कोई वस्तु नहीं, बल्कि जीती-जागती
इंसान है। लेखिका उस परंपरागत मूल्य को बदलने के लिए जी-जान से लड़ती है, जिसके तहत स्त्री को देह के घेरे में कैद कर
उपेक्षा भरी निगाहों से देखा जाता है। स्त्री की अपनी स्वयं की पहचान के लिए
लेखिका निरन्तर संघर्षरत दिखायी देती है। वह उन परंपराओं को चुनौती देती है,
जो रीति-रिवाजों और कर्मकाण्डों के नाम पर
स्त्री को आदर्शों के लत्तों से ढँक देना चाहती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा
की आत्मकथा समय और समाज की जीवन्त और वास्तविक सच्चाई को हमारे सामने उजागर करती
है। बात चाहे मैत्रेयी की हो, या फिर माँ
कस्तूरी की। दोनों ही कदम-कदम पर उत्पीड़ित और अपमानित होने का दंश झेलती हैं। धर्म,
परंपरा, कर्तव्य और मर्यादा के नाम पर स्त्री सदियों से शोषित होती
आ रही है। आत्मकथा ऐसे अनेक प्रसंगों से भरी हुई है, जहाँ स्त्री को शोषण के लिए मजबूर किया जाता है। उसे चली आ
रही लीक के साँचे में फिट होने के लिए बाध्य किया जाता है। कस्तूरी और मैत्रेयी
दोनों ही इस बने-बनाए चैखटे से पृथक अपना स्थान स्वयं निर्धारित करती हैं। परंपरा
की दुहाई देकर कस्तूरी को शोषित किया जाता है। समाज के नियमों के मुताबिक उसे
विवाह करना पड़ता है। न चाहते हुए भी उसे रीति-रिवाजों के दलदल में धकेल दिया जाता
है। कस्तूरी विवाह को अपनी नियति मानकर चुप नहीं बैठती, बल्कि अपनी इच्छा-आकांक्षाओं की अलख लिए, वह समाज से सीधे मुठभेड़ करती है। पति की मृत्यु
के बाद वह ‘सती प्रथा’ का एक नया अर्थ हमारे सामने रखती है और कहती है
- “जलकर मर जाने का कैसा
व्रत ?“1
समाज के लिए ‘सती’ आदर्श है, कस्तूरी ऐसा
आदर्श नहीं बनना चाहती, जो उससे उसकी
जिंदगी ही छीन ले। ‘सती’ के इस नए अर्थ का, खेरापतिन दादी आदि के द्वारा विरोध भी किया जाता है। आज भी
स्त्री को पति की मृत्यु के बाद निर्धारित ढाँचे में जीने को विवश किया जाता है।
कस्तूरी का यह साहस उसे परंपराओं के नाम पर स्वयं को कुर्बान करने की गवाही नहीं
देता है। इन अर्थों में कस्तूरी स्त्री जीवन को एक नई गति और नई दिशा देती है। वह
नहीं चाहती कि मरने के बाद लोग उसे पूजें,
उसे आदर्श पत्नी का दर्जा
दें। अपने हकों के लिए लड़ती कस्तूरी अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी होती है।
मैत्रेयी पुष्पा ‘कस्तूरी’ के ब्याह और फिर विधवा होने के माध्यम से समाज
को उस सच्चाई से रूबरू कराना चाहती हैं, जहाँ स्त्री को परंपरा की दुहाई देकर उसे छलने का बार-बार प्रयास किया जाता
है। स्त्री के शोषण को अपने पहलू में समेटे हुए ये रीति-रिवाज स्त्री के जीवन को
उसकी अपनी इच्छानुसार जीने का अवसर तक नहीं देना चाहते। मैत्रेयी और कस्तूरी दोनों
ही समाज की नग्न सच्चाई को उजागर कर बदलाव और परिवर्तन की सार्थक कोशिश करती हैं।
मैत्रेयी समाज को यह बताना चाहती है कि यदि ‘ब्याह’ स्त्री के लिए
अनिवार्य है तो स्त्री की अपनी इच्छा भी अनिवार्य होनी चाहिए। जबरदस्ती नहीं,
बल्कि उसकी इच्छा को मान कर विवाह की बात करना ‘ब्याह’ के नए अर्थों को हमारे सामने रखना है। मैत्रेयी यह नहीं कहती कि स्त्री को
ब्याह से आजादी मिल जाए बल्कि उसका आग्रह इस बात को लेकर है कि जीवन के फैसलों में
स्त्री की अपनी इच्छा और भूमिका दोनों ही सर्वप्रमुख और निर्णायक हों।
समाज मानता है कि
स्त्री द्वारा अपने ब्याह की बात करना न केवल लज्जाजनक है, बल्कि अपराध भी है। मैत्रेयी समाज के इन पुराने पड़ चुके
नियमों में बदलाव चाहती हैं। अपने ब्याह की बात वह खुद करती हैं। यहाँ मुद्दा
समानता और सहभागिता का है। जब ब्याह के लिए लड़के से उसकी राय ली जाती है, तो फिर लड़की से क्यों नहीं ? विवाह संस्थान में जो नियम-कानून स्त्री के लिए
बनाए गए हैं, वह पुरुषों के
लिए क्यों नहीं ? यही सवाल
मैत्रेयी को बेचैन किए रहते हैं। विवाह के लिए दहेज की अनिवार्यता को त्यागकर
योग्यता को महत्ता देना, शादी-ब्याह की
बात करने पुरुष के बजाए एक स्त्री का जाना, ये सभी बिंदु एक नवीन निर्माण की तलाश करते नजर आते हैं।
गाँव के सेठ-साहूकार कस्तूरी को बेटी के ब्याह के लिए रकम देकर ब्याज के चंगुल में
उसे फँसाना चाहते हैं, लेकिन कस्तूरी
ब्याह के नाम पर होने वाले आडम्बरों को ध्वस्त कर देना चाहती है। वह समाज के लिए
एक मिशाल बनकर सामने आती है। वह चाहती तो अपनी इकलौती बेटी को धन-दौलत देकर विदा
कर सकती थी, लेकिन वह ऐसा
नहीं करती। रीति-रिवाजों की जिस खरीद-फरोख्त से वह गुजरी थी, अपनी बेटी को उस रास्ते से नहीं गुजारना चाहती।
रस्मों के नाम पर होने वाले स्त्री के शोषण की जड़ को वह समाप्त कर देना चाहती है।
आत्मकथा के
माध्यम से मैत्रेयी उन परंपराओं पर सीधा प्रहार करती हैं, जो स्त्री के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक शोषण का कारण बनते हैं। वह महावर लगाना,
कान छेदन, मुँह दिखाई, छोहक की भेली,
गौने की प्रथा, खांड कटोरा की रस्म, देवता-पूजाई आदि रीति-रिवाजों का कच्चा चिट्ठा खोलने का
साहस करती हैं। वह समाज को इन रस्मों की हकीकत बताना चाहती है कि कैसे एक स्त्री
को इन रिवाजों की आड़ में बार-बार बलि की वेदी पर चढ़ाने की लगातार कोशिश की जाती
है। मैत्रेयी विवाह के प्रसंग के माध्यम से ब्याह संबंधी कुरीतियों को दूर कर देना
चाहती हैं। वह चाहती हैं कि लड़का-लड़की का ब्याह उनकी अपनी इच्छा से हो। एक अन्य
महत्त्वपूर्ण बात है - ‘जातिप्रथा’
जो अक्सर ही ‘ब्याह’ के लिए आड़े आ
जाती है। मैत्रेयी जाति के इन बंधनों को न मानकर अपनी बेटी को अंतर्जातीय ब्याह
करने की स्वीकृति दे देती हैं। लेखिका के लिए ‘प्रेम’ और ‘निजइच्छा’ का प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण है, जाति, स्टेटस और
धन-दौलत ये सारी चीजें स्त्री को सिर्फ बंधनों में कैद करती हैं। मैत्रेयी चाहती
हैं कि ‘ब्याह’ स्त्री और पुरुष का पवित्र रिश्ता बनकर सामने
आए, जिसकी नींव प्रेम और
विश्वास पर टिकी हो। ब्याह संबंधी अपने नवीन मतों के कारण मैत्रेयी पुष्पा परंपरा
को नूतनता से जोड़ती हुई हमारे सामने आती हैं। लेखिका का मानना है कि स्त्री और
पुरुष का आपसी तालमेल ही दाम्पत्य-जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। स्वयं
मैत्रेयी का वैवाहिक जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
समाज के विकास के
लिए यह आवश्यक है कि परंपरा अपने परिवर्तित रूप के साथ ही आधुनिकता को ग्रहण करती
चले। प्रासंगिक वही होता है, जो अपने समय और
परिस्थितियों के अनुसार नवीनता को आत्मसात कर सके। मैत्रेयी इस सत्य को जानती हैं।
‘कस्तूरी कुण्डल बसै’
और ‘गुड़िया-भीतर-गुड़िया’ में वह पंरपरा और
नवीनता के इस द्वंद्व को हमारे सामने रखती हैं। कस्तूरी और मैत्रेयी दोनों ही
रूढ़ियों से संघर्ष करती हुई एक उन्नत समाज के निर्माण की आकांक्षा करती हैं। इसके
लिए अपनी पूरी कोशिश भी करती हैं। कस्तूरी की माँ ‘चाची’ पंरपराओं में जकड़ी हुई हैं, वहीं कस्तूरी एक नई सोच लेकर हमारे सामने आती
हैं। आत्मकथा में कुछ प्रसंग ऐसे भी आते हैं, जब मैत्रेयी की सोच कस्तूरी से अधिक प्रासंगिक जान पड़ती है।
वहीं कुछ मामलों में कस्तूरी अपनी बेटी मैत्रेयी से भी अधिक आधुनिक दिखायी देती
है। मैत्रेयी के दूसरी बार माँ बनने पर कस्तूरी, मैत्रेयी को आड़े हाथों लेती है। परिवार-नियोजन का पूरा
ख्याल है कस्तूरी को, जबकि मैत्रेयी का
ध्यान इस ओर जाता ही नहीं और वह तीन बार माँ बनती है। कस्तूरी मैत्रेयी को तब भी
बहुत समझाती है, जब वह शादी के
कुछ महीने बाद ही माँ बन जाती है। कस्तूरी की नजर में, कम उम्र में माँ बनना, एक स्त्री को दासत्व की जंजीरों में अधिक बाँधता है।
आत्मकथा में एक
द्वंद्व की स्थिति दिखाई देती है। कस्तूरी और मैत्रेयी के माध्यम से यह
द्वंद्वात्मक स्थिति पूरी तरह उजागर हो जाती है। लेखिका आत्मकथा में शोषण के उस
तंत्र को भी दिखाती है, जिसमें सामान्य
जन पिस रहा था। अंग्रेजों के जाने के बावजूद समाज में स्त्री का शोषण करने वाले
जमींदारों का चित्रण आज भी प्रासंगिक है। लगान वसूली का चित्रण आत्मकथा को वर्तमान
समय से सीधे जोड़ देता है। साधनहीन होेते हुए भी कस्तूरी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से
अपने परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेती है। आगे आने वाली पीढ़ी के लिए वह एक
मिसाल का काम करती है।
भारतीय समाज की
एक प्रमुख समस्या है - बच्चों की सोच को महत्त्व न दिया जाना। मैत्रेयी के साथ भी
यही होता है। कस्तूरी अपनी बेटी के बालमन को जानना ही नहीं चाहती। एक स्त्री के
लिए शिक्षा प्राप्त करना कितना कठिन और संघर्ष से भरा होता है, मैत्रेयी उसे बखूबी सामने रखती हैं। परंपरा तो
यही कहती आई है कि स्त्री अपना जीवन चूल्हा-चैके में ही खपा दे। समाज के अनुसार
ज्ञान का अधिकारी पुरुष है, स्त्री इस
क्षेत्र से कोसों दूर है। कस्तूरी और मैत्रेयी इस चली आ रही परंपरा को तोड़कर समाज
के सामने अपने साहस का परिचय देकर शिक्षा के प्रश्न को नए संदर्भों से जोड़ती हैं।
कस्तूरी पति की
मृत्यु पर रोती नहीं है, बल्कि उसे तो
अपने भविष्य की चिन्ता है कि कैसे विकास किया जाए ? सिर्कुरा वासियों का नजरिया धीरे-धीरे बदलने लगता है,
जब कस्तूरी को नौकरी मिल जाती है। कस्तूरी कहती
है, ”पढ़ने जाना लोगों की आँखों
में कैसा खटकता था। नौकरी मिलना उन्हीं लोगों को नियामत लग रहा है, क्योंकि यह आना-जाना पैसे से बंधा है।“2
कस्तूरी का
व्यक्तित्व एक ओर उसकी अदम्य जिजीविषा, शक्ति और संघर्ष को हमारे सामने रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके अंतर्विरोध और कमजोरियों को भी सामने ला
देता है। वह पढ़ी-लिखी है, फिर भी उसे अपनी
बेटी मैत्रेयी का लड़कों से बात करना पसंद नहीं। सिनेमा देखना उसकी नजर में पाप है।
मैत्रेयी के ब्याह संबंधी दिक्कतों से आहत होकर अपनी बेटी को ही वह मुलजिम बना
देती है।
मैत्रेयी एक नए
विमर्श की बात करती हैं, जहाँ पुरुष
विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी
बनकर सामने आते हैं। कस्तूरी के ससुर, दादा चिमन सिंह और मैत्रेयी के पति डॉक्टर साहब ऐसे ही सहयोगी हैं, जो कस्तूरी और मैत्रेयी की बराबर मदद करते रहते
हैं। कस्तूरी जब पढ़ने जाती है तब उसके ससुर बच्ची को नहाने से लेकर घर के काम-काज
तक निपटाने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। बाबा (कस्तूरी के ससुर) की बात को अपनी
बेटी के सामने रखते हुए कस्तूरी कहती है - ”तेरे बाप के मरने के बाद मैंने हिम्मत नहीं हारी, क्योंकि उन्होंने हिम्मत साधी थी......। मैं
रोती न थी, मरने की बात सोचती थी।
जिंदगी से मोह छोड़ देने वाले को संतान का, घर का और दुनिया का मोह जगाया-अरी कस्तूरी, मरना था तो हीरा की चिता में चढ़कर मर जाना था, लोग तुझे सती कहते। अब तो कहेंगे कायर। बेटी के
पालन-पोषण और पति के लिए हुए कर्ज से मुँह छिपाकर भागने वाली डरपोक। मौत के खास में
चाल-चलन पर भी शंका करेंगे, क्योंकि तू औरत
है। ऐसा खोटा समय तुझ पर ही नहीं, मुझ पर भी आया था,
जब हीरा की माँ नहीं थी। दूध मुँहा बच्चा मेरे
पास था, मगर माँ का दूध न था।
रोकर आंसू तो नहीं पिला सकती थी उसे। और न भागकर भगवान भरोसे छोड़ सकती थी। जीना,
मरने से ज्यादा मुश्किल है और मुश्किलों से
निकलना आदमी ही जानता है। तू तो दिलेरी और बुद्धिमानी दोनों की मालकिन है।“3
मैत्रेयी भी दादा चिमन सिंह के यहाँ रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखती है। यहाँ वह
दादा की लाडली बेटी बनकर उनके परिवार के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाती है। विवाह के
समय ‘खांड-कटोरा’ वाले प्रसंग पर डॉक्टर , मैत्रेयी का साथ देते हैं, अपने घरवालों का नहीं। कस्तूरी और मैत्रेयी दोनों ही
पुरुषों के सहयोग से अपना विकास करती हैं। इस दृष्टि से मैत्रेयी का स्त्री विमर्श,
पुरुष के विरोध की नहीं, बल्कि सहयोग की माँग करता है।
आत्मकथा में
मैत्रेयी जातिव्यवस्था के प्रश्न को भी उठाती हैं। शिक्षा, विवाह और कविता लेखन संबंधी प्रसंग समाज में व्याप्त
असमानता, छुआछूत संबंधी प्रश्नों
को उभारते हैं। मैत्रेयी के बचपन का साथी ‘एदल्ला’ ऊँची जाति में
जन्मे बच्चों का बोझा ढोने के लिए मजबूर है। वह उन बच्चों का खाना तक नहीं छू सकता
और न ही उनके साथ बराबरी में बैठ सकता है। खाना छू जाने पर जाटों के लड़के उसे इतना
पीटते हैं कि वह उठ नहीं पाता। मैत्रेयी पुष्पा यहाँ एक बेहद महत्त्वपूर्ण प्रश्न
उठाती हैं कि यदि दलित के खाना छूने से सवर्णों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है,
तब फिर उनके द्वारा दलित को पीटने पर धर्म कैसे
बचा रह सकता है ? आत्मकथा के
माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को जड़ से समाप्त करने
की बात करती हैं। आज भी दलित अपमान झेलने को मजबूर हैं। निर्दोष होते हुए भी
लगातार उत्पीड़न झेल रहे हैं। जाति संबंधी कुछ मामलों में कस्तूरी की सोच भी परंपरा
से जकड़ी हुई है। अपनी सारी आधुनिकता और आजाद ख्यालों के बावजूद वह अपनी बेटी का
ब्याह अपनी ही जाति में करना चाहती है, दादा चिमन सिंह के प्रस्ताव को वह बिना सोचे-बिचारे एक पल में ठुकरा देती है -
”ऐसा आप सपने में मत सोचना,
मुझे इसके पिता के गाँव वालों को जवाब देना है
पूछेंगे, लड़की कहां डाल आई ?
जवाब दे पाऊँगी कुछ।“4 मैत्रेयी के ब्याह के समय हबीबन द्वारा बर्तन माँजना,
टेªनिंग सेंटर की घटना, सुजाता (मैत्रेयी
की बेटी) का ब्याह संबंधी प्रसंग जाति के प्रश्न को हमारे सामने लाता है।
मैत्रेयी समाज
में समानता चाहती है, जहाँ किसी प्रकार
का भेदभाव न हो। आज भी दलितों को अस्पृश्य माना जाता है। महानगरों में फिर भी यह
भेदभाव काफी हद तक कम हुआ है, लेकिन गाँव और
कस्बों में दलितों के साथ पशुवत व्यवहार आज भी किया जाता है। मैत्रेयी समाज से इसी
व्यवहार के बदलाव की उम्मीद लेकर एक ऐसे समाज की निर्मिति चाहती हैं, जहाँ वर्णगत, जातिगत असमानता न होकर मनुष्यगत समानता स्थापित हो। ‘बाड़े की औरतों के लिए’ शीर्षक से कविता लिखकर मैत्रेयी जाति व्यवस्था की सच्चाई को
सबके सामने उजागर कर देती हैं -
”बाड़े के लोगों को
पानी पिलाने वाली माटौन,
अपने कंधे और
बांहों को देख
जो पुष्ट है
मजबूत भी
नाजुक भोली भेड़े
मगर समझ रही हैं, तू भूखी है
उनके चैके में
बने परांठों पर गवां देगी अपनी जात
और जानती है यह
भी कि तेरी जात के बिना
सूख जाएँगे उनके
हलक
काछिन काकी!
तू इसलिए काकी है
कि गोड़ क्यारियाँ आए पौधे, खिलाए फूल
और ले नहीं अपने
श्रम का दाम
इक छोड़ने की एवज
में पीले बारिक बोन चायना के
- कप में चाय
मगर पौधे नहीं
छोड़ने देंगे अधिकार
उगकर, बढ़कर और खिलकर, करेंगे तेरे श्रम और
हुनर की मुनादी
कौन रोक सकता है
उन्हें ?
ये परांठे खाती
नहीं, चाय पीते नहीं, बस
ग्रहण करते हैं
तेरे हाथ का खाद, पानी
और मेहतर बहू!
नगर एक दिन जानने
वाला है,
कि कितना जोर
बांध रखा है अपनी बाजूओं में
तूने
संडास के रास्ते
ही सही, आ गई आंगन तक
और चढ़ती जाती है
छत पर
कैसे छिपा पाएगा
अब यह कि कोई बाड़ा तुझे ?“5
समाज को मैत्रेयी
की यह बात आखिर बर्दाश्त कैसे होती ? परिणामस्वरूप उसे वह कमरा खाली करना पड़ता है, जिसमें वह रह रही थी। यह समाज-व्यवस्था का सच है कि सच
बोलने और वास्तविकताओं को उजागर करने वालों को कभी कुलटा, तो कभी वेश्या जैसे शब्दों से जोड़ दिया जाता है। मैत्रेयी
के साथ भी यही होता है। इतना सब सहने के बावजूद मैत्रेयी अपने दृढ़ निश्चय पर अडिग
रहती है।
परंपरा कहती है
कि विधवा स्त्री की अपनी कोई इच्छाएँ नहीं होती। मैत्रेयी पुष्पा अपनी आत्मकथा के
माध्यम से एक विधवा जीवन की हकीकत हमारे सामने लाती हैं। समाज की मर्यादा, नैतिकता के समक्ष कस्तूरी (विधवा) अपनी
स्वाभाविक इच्छा का विकल्प समलैंगिकता में ढूँढ़ लेती है। मैत्रेयी यहाँ यह बताना
चाहती हैं कि कैसे एक स्त्री अपनी सेक्स इच्छा को दमित करने के लिए मजबूर हो जाती
है। कस्तूरी यहाँ एक नया मार्ग तलाशती है और वैधव्य को त्यागकर अपनी इच्छाओं की
पूर्ति गौरा के माध्यम से करती है। यहाँ वे परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण हैं,
जिनके कारण एक स्त्री समलैंगिकता का मार्ग
अपनाने को बाध्य हो उठती है। कैसा समाज है यह ? जहाँ स्त्री की इच्छाओं - आकांक्षाओं का कोई महत्त्व ही
नहीं ? मैत्रेयी एक ऐसे समाज को
निर्मित करना चाहती है, जहाँ स्त्री को
अपने जीवन के मानदंड तय करने का पूरा अधिकार मिले। कस्तूरी की यौनाकांक्षा के
माध्यम से मैत्रेयी एक नया विमर्श खड़ा करती है। आज भी समाज विधवा स्त्री को एक
चैखटे के भीतर जीने को बाध्य करता है। मैत्रेयी इस चैखटे को तोड़कर एक बदलाव,
एक निर्मिति चाहती हैं और परिवर्तन की उम्मीद
लिए वह स्त्री के लिए सेक्स को वर्जित बनाने के ढोंग का खुलासा करती हैं। मैत्रेयी
कहना चाहती हैं कि स्त्री को, पुरुषों के समान
अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, तभी एक उन्नत
समाज का निर्माण होगा। जब पुरुष अपनी देह का स्वामी हो सकता है, तो स्त्री क्यों नहीं ? ‘सेक्स के मामले में समानता’ के मुद्दे को उठाकर मैत्रेयी पुष्पा ‘फीमेल सेक्सुअल्टी’ के सवाल को खड़ा करती हैं। भारतीय समाज-व्यवस्था पुरुष के सक्रिय होने की बात
तो करता है, लेकिन स्त्री की
नहीं। अपने वैवाहिक जीवन के माध्यम से मैत्रेयी इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर
देती है। वह पति से सीधे सवाल करती है - ”पहले बताओ कि मर्द की कूबत नहीं थी, तो ब्याह क्यों किया ? हमने पार लगा
दिया तो नखरे पसारने लगे ? समझे रहना कि
नखरे-बखरे अच्छे नहीं लगते।“6
आत्मकथा के
माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा एक स्त्री की राजनीतिक सक्रियता के मुद्दे को भी उठाती
हैं साथ ही देश के राजनीतिक दाव-पेंच और शासन-व्यवस्था की पोल को काफी हद तक खेाल
देती हैं। मुख्यमंत्री द्वारा कस्तूरी के पद और उसके आंदोलन को खत्म कर उसे जेल
में बंद करने संबंधी प्रसंग एक स्त्री के सच को हमारे सामने लाते हैं। स्त्री को ‘औरत जात’ कहकर बहलाने की बात की जाती है, लेकिन कस्तूरी समाज और शासन व्यवस्था की इन झूठी बातों में
नहीं आती है। यहाँ उसका स्वर सम्पूर्ण स्त्री-जाति की चेतना के स्वर को हमारे
सामने लाता है। मैत्रेयी का यह कहना वास्तव में प्रासंगिक है - ”जब तक स्त्री आजाद नहीं होगी, उसके विचार स्वच्छंद नहीं होंगे, तब तक हम कैसे मान लें कि देश ने आजादी हासिल
कर ली है या फिर देश आजाद है।“7
मैत्रेयी पुष्पा
की यह आत्मकथा ग्रामीण भारत की समस्याओं, शासन-व्यवस्था और समाज-व्यवस्था के बाह्याडम्बरों को अपने संपूर्ण
अंतर्विरोधों के साथ चित्रित करती है। व्यवस्था के दमन को झेलने के बावजूद यहाँ
स्त्री अपने सपने को नहीं त्यागती। जीवन से लड़ते हुए वह जीवन जीती है। ‘अब घर का कारागार टूट रहा है’ का उद्घोष, न केवल एक स्त्री के बंधनहीन जीवन जीने का सूचक है, बल्कि एक नवीन और उन्नत समाज के निर्माण का
परिचायक भी है। आत्मकथा की सार्थकता इस बात में है कि लेखिका एक स्त्री के माध्यम
से सम्पूर्ण समाज के विनिर्मित होने की आकांक्षा हमारे सामने रखती है। कहीं कोई
ध्वंस नहीं और न ही विनाश, फिर भी समाज बदल
रहा है, नियम उसके अनुकूल हो रहे
हैं, यही तो परिवर्तन है।
बदलाव की यही उम्मीद, आत्मकथा को
वर्तमान संदर्भों से जोड़ देती है। अब स्त्री ‘दासी’ या ‘देवी’ नहीं है उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व है। आज स्त्री दया, लज्जा, ममता, करुणा आदि गुणों का प्रतीक मात्र न होकर अपना
स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। वह अपने -गौरव को पहचानने लगी है कि वह मात्र भोग्या
नहीं है। आधुनिक समाज में स्त्री की जो छवि उभरकर सामने आयी है, वह प्राचीन और मध्यकालीन संस्कारों को पूरी तरह
से तोड़ती है। अब वह धर्म, परंपरा के
चक्रव्यूह में फँसने की बजाए शोषण के इन औजारों पर कठोर प्रहार कर रही है। स्त्री
की इस लड़ाई में पुरुष भी यह महसूस करने लगे हैं कि स्त्री को भी समानता का हक
मिलना चाहिए। ‘गुड़िया भीतर
गुड़िया’ में अन्त तक आते -आते
मैत्रेयी के डॉक्टर पति, पत्नी के सहयोगी
बनकर सामने आते हैं। बदलाव की जो आकांक्षा मैत्रेयी ने की थी, वह धीरे-धीरे सच होने लगती है। मैत्रेयी के
यहाँ स्त्री एक सशक्त इकाई बनकर सामने आती है - व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र की।
मैत्रेयी पुष्पा
की यह आत्मकथा इक्कीसवीं शताब्दी की दहलीज पर खड़ी, स्त्री मुक्ति के कगार को छूने को लालायित एक ऐसी स्त्री की
संघर्ष-गाथा है, जो छल-पोषित
पंरपरा से मुक्ति चाहती है। इसके लिए वह विद्रोह भी करती है। धीरे-धीरे उसका
विद्रोह साकार रूप लेने लगता है और विद्रोह के उस भंवर में रूढ़ियों, परंपराओं, लांछन और लोकाचार के कुंडल टूटने लगते हैं। न केवल ‘आत्मकथा’ का शीर्षक बल्कि ‘अध्यायों’ के शीर्षक भी
मैत्रेयी कबीर से उधार लेती हैं। यहाँ ये अध्यात्मिक प्रतीक अपने रहस्यवादी
कुंडलों से मुक्त होकर एक नया अर्थ देते हैं। मैत्रेयी इस समाज को बदलना चाहती है।
वह लुकाठी लिए समाज और साहित्य के बाजार में खड़ी है। देखना यह है कि किस -किसमें उनके साथ चलने का साहस है?
अंत तक आते-आते मैत्रेयी अपनी सारे कुंडलों को
त्यागकर एक नया संदेश देती है - कि स्त्री की कस्तूरी अब किसी कुंडल में कैद न
होकर उसके स्वातंत्र्य, साहस, सामथ्र्य और स्वाभिमान में है।
संदर्भ.
1.मैत्रेयी पुष्पा - कस्तूरी कुण्डल बसै, पृ. 21
2.वही, पृ. 43
3.वही, पृ. 112
4.वही, पृ. 55
5.वही, पृ. 176
6.वही, पृ. 251
7.वही, पृ. 156
शोध-छात्रा, भारतीय भाषा केन्द्र,लोहित छात्रावास,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,दिल्ली
संपर्क सूत्र:-7838327845 ई मेल:- sweetyyadavjnu@gmail.com
Mei maitreyiji ki sansmaran 'aganpaķhi' padhna chahta hoon
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