चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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साहित्यिक दस्तावेज़:हिंदी में लघु पत्रिकाएँ : एक अध्ययन/ निकिता जैन
हिंदी साहित्य की विकास-यात्रा का अध्ययन करना हो तो हमें सबसे पहले लघु – पत्रिकाओं का अध्ययन करना होगा | लघु -पत्रिकाओं के माध्यम से अनेक साहित्यिक आन्दोलनों का प्रचार -प्रसार हुआ है, न जाने कितने ही श्रेष्ठ रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाश में आईं | लेकिन आज जब पत्रकारिता का क्षेत्र इतने विस्तृत रूप में
अपनी जड़ें जमा चुका है तब ‘लघु-पत्रिका’ की पहचान करना मुश्किल हो जाता है | सरल शब्दों में लघु पत्रिका का अर्थ है - एक ऐसी पत्रिका जो व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा सीमित
संसाधनों से निकाली जाए| ऐसी पत्रिकाओं की सबसे प्रमुख
विशेषता यह होती है कि यह पत्रिकाएँ किसी प्रतिष्ठित संस्थान या प्रकाशनों द्वारा
परिचालित नहीं होती हैं | यहाँ पर “लघु-पत्रिका” का अर्थ ‘केवल लघु आकार या प्रसार का
लघु दायरा नहीं है’1. बल्कि एक ऐसी दृष्टि है जो व्यवस्था के कुकृत्यों के खिलाफ विद्रोही चेतना को
तैयार करती है | दूसरे शब्दों में कहा जाए तो
यह पत्रिकाएँ नि:स्वार्थ साहित्य सेवा करती
हैं तथा व्यवस्था के सामंती पूंजीवादी मूल्यों का विरोध कर, प्रगतिशील भूमिका अदा करती हैं |2. सीमित पूँजी व संसाधनों के
कारण अधिकतर लघु-पत्रिकाएँ शीघ्र ही बंद हो
जाती हैं | पत्रिकाओं का संघर्ष व्यवस्था
द्वारा भी बढ़ाया जाता है, इनके अस्तित्व व प्रभाव को
समाप्त करने के लिए पत्रकारिता का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण करके |
60 से 70 के दशक में हिंदी का लघु-पत्रिका आन्दोलन दरअसल पत्रिकाओं के व्यावसायीकरण के खिलाफ
ही खड़ा हुआ | भारतेंदु युग से लेकर 1947 तक जितनी भी पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं वह सभी पत्रिकाएँ एक
उद्देश्य के तहत निकाली गयीं थीं | स्वतंत्रता आन्दोलन की बात हो या हिंदी साहित्य के परिष्कार की, उस समय की पत्रिकाओं ने हर क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका
अदा की | तत्कालीन पत्रिकाओं का ध्येय पूँजी
कमाना नहीं था | हालांकि यह बात और है कि उस
समय अधिकतर पत्रिकाएँ सुविधासंपन्न व्यक्तियों एवं संस्थानों से निकाली जा रही थीं
लेकिन यह सत्य है कि उन पत्रिकाओं का लक्ष्य केवल और केवल समाज-सुधार एवं व्यवस्था के कार्यों के प्रति अपना विरोध दर्ज
करवाकर देश को आज़ाद करवाना था | हालांकि उस समय भी कुछ लोग निजी संसाधनों द्वारा पत्रिका निकाल रहे थे लेकिन
उन पत्रिकाओं की रूपरेखा एवं विषयवस्तु व्यावसायिक पत्रिकाओं जैसी नहीं थी | आज़ादी के बाद जिन पत्रिकाओं को ‘बड़े घराने की पत्रिका’ के नाम से संबोधित किया गया उनमें साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, सारिका इत्यादि पत्रिकाएँ शुमार थीं |
इन पत्रिकाओं को रंगीन पत्रिका भी कहा गया |3. इन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की विचारधारा नए लेखकों की
विचारधारा से बिलकुल अलग थी | दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह पत्रिकाएँ सामन्ती समाज और उसकी नीतियों का
विरोध नहीं कर रही थीं जबकि स्वतंत्रता के पश्चात आम-आदमी की जो उम्मीदें व्यवस्था या सरकार से थीं वे पूरी तरह
मिट्टी में मिल चुकी थीं | और उनकी इस पीड़ा और विद्रोही स्वर को यह बड़ी पत्रिकाएँ नज़र-अंदाज़ कर रही थीं तथा केवल अपनी पत्रिकाओं का व्यावसायीकरण
करने में लगी हुई थीं | हालांकि धर्मयुग के संपादक ने
बड़े घरानों की पत्रिका पर लगे इस आरोप को नकारा है – “ जब तक पत्रिका के उत्पादन में किसी न किसी रूप में किसी न
किसी का पैसा लगता है और छपने के बाद पत्रिका को बेचकर उस लागत को पूर्ण या आंशिक
रूप में वापस वसूलने की अनिवार्यता है, तब तक किसी न किसी रूप में व्यवसाय पत्रिका से जुड़ा
रहता है, उससे जुड़ा रहने वाला व्यवसाय भी उसी अनुपात में छोटा या बड़ा हो
सकता है |..........................व्यवसाय तो हर हालत में
अनिवार्य है, लेकिन व्यवसाय अनिवार्यत: व्यावसायिकता नहीं | व्यावसायिकता तब आती है जब हम साहित्यिक संस्कार की
उपेक्षा कर दें |”4.
यहाँ भारती बड़े घरानों की पत्रिकाओं की मजबूरी को दिखा रहे
हैं हालांकि यह बात सही है कि व्यवसाय कुछ मायनों में हर पत्रिका चाहे वे बड़ी हो
या छोटी, से जुड़ा हुआ है लेकिन यहाँ
बात पत्रिका की वैचारिकी की भी है कि और ये प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ अपनी उद्देश्य से
भटक गयी थीं क्योकि केवल व्यवसाय का ही सवाल होता तो स्वतंत्रता से पहले जो
पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं उन सभी पत्रिकाओं के साथ भी व्यवसाय का सवाल जुड़ा था
लेकिन कभी भी उन पत्रिकाओं व्यवसाय की परवाह नहीं की और अपने साहित्यिक संस्कार को
हमेशा सर्वोपरी रखा | कुछ लोग ज़रूर सरस्वती जैसी
पत्रिकाओं पर यह आरोप लगाते हैं कि उस ज़माने में 20 हज़ार प्रतियाँ सरस्वती की छपती थीं तो कहीं न कहीं सरस्वती पत्रिका
भी आर्थिक लाभ हेतु निकाली जाती थी | लेकिन इसके साथ यह भी सत्य है कि सरस्वती पत्रिका न जाने कितने ही रचनाकारों
को पहचान दिलाई है | सरस्वती पत्रिका ने कभी-भी नए लेखकों की रचनाओं से परहेज़ नहीं किया | बल्कि महावीर प्रसाद द्विवेदी स्वयं उन रचनाओं में संशोधन
करके उन्हें छापते थे क्योंकि इन पत्रिकाओं की वैचारिकी अपने लक्ष्य से नहीं भटकी
थी और इस परंपरा का निर्वाह यह बड़े घराने की पत्रिका नहीं कर रही थीं | इन पत्रिकाओं के साथ एक समस्या यह भी रही कि इन पत्रिकाओं में अधिकतर रचनायें उन्हीं लेखकों की छपती रहती
थीं जो इनके प्रकाशन या संस्था का हिस्सा बन गए थे | नयी पीढ़ी इन पत्रिकाओं में प्रवेश पाने में असमर्थ थी और
इसी के खिलाफ उन्होनें अपना प्रतिरोध ‘लघु -पत्रिका आन्दोलन’ के द्वारा दर्शाया|
स्वतंत्रता से पूर्व निकलने
वाली पत्रिकाओं को ‘लघु-पत्रिकाओं’ की श्रेणी में क्यों नहीं रखा गया ?- कई बार यह सवाल ज़ेहन में आता है कि अगर लघु पत्रिका का अर्थ
प्रतिरोध की ज़मीन तैयार करना है तो यह काम तो भारतेंदु युग से ही शुरू हो गया था जब 1857 के ग़दर जैसी महत्वपूर्ण घटना घटी थी | उसके पश्चात कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन,हिंदी प्रदीप जैसी सैकड़ों पत्रिकाओं ने तत्कालीन सरकार के खिलाफ जनता के दिलों
में प्रतिरोध की ज्वाला को भड़काना शुरू कर दिया था | व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह तो उस समय की अधिकांश पत्रिकाओं
में परिलक्षित होता है तो फिर इन पत्रिकाओं को लघु पत्रिकाओं की श्रेणी से क्यों
बाहर रखा जाता है ? दरअसल उस समय जिन पत्रिकाओं
का प्रकाशन किया जा रहा था उन सभी पत्रिकाओं का एक ही मूल स्वर था ‘स्वतंत्रता’ | और इसी मूल स्वर को केंद्र में रखकर भारतेंदु ने साहित्य में नयी-नयी विधाओं के विकास में योगदान दिया | दूसरे, उस समय सभी व्यक्ति चाहे वह साहित्य प्रेमी हों या क्रांतिकारी अपने निजी प्रयासों
द्वारा ही पत्रिका निकाल रहे थे | भारतेंदु, प्रेमघन, बालकृष्णभट्ट और इनसे भी पहले राजा राममोहन राय सभी ने पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन निजी प्रयासों द्वारा ही किया | 19वीं शताब्दी के अंत तक ऐसी प्रकाशन संस्थाएं नहीं आईं थीं
जिनका ध्येय पत्रकारिता के ज़रिये व्यावसायिकता पर जोर देना रहा हो | इस दृष्टि से देखा जाए तो तब ‘लघु’ या व्यावसायिक अर्थात ‘बृहद’ पत्रिका प्रश्न ही नहीं था इसलिए
अधिकतर विद्वानों, विचारकों ने उस समय की
पत्रिकाओं को लघु पत्रिका नहीं माना है |
लेकिन अगर दूसरी दृष्टि से लघु पत्रिकाओं का विश्लेषण किया जाए तो स्वतंत्रता
से पूर्व निकलने वाली पत्रिकाओं को ‘लघु पत्रिकाओं’ के अंतर्गत शामिल किया जाना चाहिए | इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि किसी भी प्रवृत्ति या आन्दोलन
की शुरुआत तुरंत नहीं हो सकती है उसके पीछे कुछ प्रमुख कारक ऐसे भी रहते हैं जो सालों से उस आन्दोलन की पूर्वपीठिका के रूप में पहले से कार्यरत हों | स्वतंत्रता से पहले की ये पत्रिकाएँ किसी ना किसी मायनों में लघु पत्रिका आन्दोलन से जुड़ी रही हैं या यह कहा जाए की यह आंदोलन शायद इन पत्रिकाओं
द्वारा ही अभिप्रेरित हो ? भारतेंदु एवं उसके पश्चात जितनी भी पत्रिकाएँ निकल रही थीं उन सभी पत्रिकाओं का विद्रोह केवल और केवल अंग्रेजों की नीतियों एवं उनकी व्यवस्था से था | एक और बात ध्यातव्य है कि उस
समय केवल यही पत्रिकाएं थीं जो समाज-सुधार, साहित्य के परिष्कार में लगी
हुईं थीं | हालांकि बीसवीं सदी के शुरूआती
दशकों में इंडियन प्रेस जैसे व्यावसायिक संस्थान पत्रिका-प्रकाशन में सक्रिय थे5. पर उनका वर्चस्व इतना भी विस्तृत नहीं था जिनके
द्वारा साहित्य और समाज के सम्बन्ध को
परिभाषित करने वाली नयी पीढ़ी को नज़रअंदाज़ किया जा रहा हो | साहित्य की दृष्टि से भी भारतेंदु युग की पत्रिकाओं के
द्वारा ही नयी गद्य विधाओं का विकास हुआ | एक तरह से तत्कालीन समाज में इन पत्रिकाओं ने अपना एक अलग ही आन्दोलन शुरू कर
दिया था | अगर इन पत्रिकाओं की विवेचना नहीं की जायेगी तो शायद ‘लघु पत्रिकाओं’ की वैचारिकी को विस्तृत रूप से व्याख्यायित करना असंभव होगा | यह पत्रिकाएँ हर लिहाज़ से ‘लघु पत्रिका’ की श्रेणी में शामिल होनी
चाहियें |
लघु पत्रिका आन्दोलन – अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भ
‘लघु पत्रिका’ का नामकरण, संभवत: पश्चिमी देशों में चले ‘लिटिल मैगज़ीन’ आन्दोलन की तर्ज पर ही किया गया है | क्योंकि भारतीय (हिंदी) लघु पत्रिका आन्दोलन तथा विदेशी ‘लिटिल मैगज़ीन मूवमेंट’ की प्रकृतिगत विशेषताओं में बहुत समानता है | स्वयं को लघु -पत्रिका या लिटिल मैगज़ीन कहने वाले प्रकाशनों की
शुरुआत द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान फ़्रांस के रजिस्टेंस समूह से मानी जाती है | ज्यां-पाल सार्त्र जैसी हस्तियाँ भी इसमें शामिल थीं| चूँकि रजिस्टेंस समूह की पत्रिका का तेवर सत्ता के
खिलाफ था इसलिए उसे प्रतिरोध की आवाज़ होने की पहचान मिली |6. कुछ विद्वान् पश्चिम में लिटिल मैगज़ीन की शुरुआत
शिकागो से निकलने वाली पत्रिका ‘Poetry: the Magazine of Verse’ (1912) से भी मानते हैं| 20 वीं शताब्दी के आरंभिक दिनों में -इंग्लैंड,जर्मनी,इटली तथा रूस जैसे कई देशों
में यह आन्दोलन आरम्भ हुआ | इन सभी देशों की परिस्थितियाँ भले ही अलग-अलग रहे हों लेकिन विद्रोह का स्वर और लक्ष्य एक ही था | बड़े घरानों से निकलने वाली पत्रिकाओं तथा अकादमिक पत्रिकाओं
में ‘नये लेखकों’ को स्थान ना देने के कारण तथा साहित्य में नए रचनात्मक
प्रयोगों को एक आधार प्रदान करने हेतु लिटिल मैगज़ीन मूवमेंट या लघु पत्रिका
आन्दोलन अस्तित्व में आया | लघु पत्रिका आन्दोलन की यह खासियत है कि पश्चिम और भारत में
इस आन्दोलन ने सांस्कृतिक सन्दर्भों को भी प्रभावित किया इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी
कि इस आन्दोलन से केवल साहित्यकर्मी ही नहीं जुड़े बल्कि थियेटर, कला से सम्बंधित व्यक्तियों ने भी इस आन्दोलन की अगुवाई की | इसलिए यह आन्दोलन केवल समाज, साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि राजनीतिक एवं सांस्कृतिक
रूप से भी ये आन्दोलन प्रभावकारी सिद्ध हुआ |
राष्ट्रीय सन्दर्भ-
भारत में ‘लघु पत्रिका आन्दोलन’ की शुरुआत सबसे पहले बंगाल से होती है | साहित्य की दृष्टि से बंगाल हमेशा से एक महत्वपूर्ण भूमिका
निर्वाह करता आ रहा है चाहे वह बांगला साहित्य हो या हिंदी साहित्य | वैसे भी भारतीय नवजागरण के बीज सबसे पहले बंगाल में ही उपजे
थे | इसी प्रकार लघु पत्रिका
आन्दोलन के लक्षण भी सबसे पहले बंगाल में ही अवतरित हुए | सन् 1923 के आस -पास ‘कल्लोल’ नामक पत्रिका बंगाल के लघु
पत्रिका आन्दोलन की आधार स्तम्भ थी | इस आन्दोलन की शुरुआत में सबसे लोकप्रिय कार्यकर्ताओं में मोहितलाल मजुमदार (1888- 1952 ), काज़ी नजरुल इस्लाम (1899-1976), अचिन्त्याकुमार सेनगुप्ता(1882-1922) इत्यादि लोग थे | ‘कल्लोल’ पत्रिका को लघु पत्रिका आन्दोलन की पूर्वपीठिका कहा जा सकता है| क्योंकि इसके बाद सन् 1961 में लघु पत्रिका आन्दोलन बंगाल में बहुत तेजी से आगे बढ़ा और
इसने पूरे बांगला साहित्य को प्रभावित किया | लघु पत्रिका आन्दोलन ने भारत के और क्षेत्रों को भी
प्रभावित किया लेकिन सबसे ज्यादा इस आन्दोलन ने अपनी छाप बंगाल पर छोड़ी | आज भी कम से कम 1000 लघु पत्रिकाएँ बंगाल से निकल रही हैं और अपने नए रचनात्मक
प्रयोगों द्वारा बांगला साहित्य को समृद्ध कर रही हैं |
1955 से लेकर 1975 तक मराठी में लघु पत्रिका आन्दोलन का अपना वर्चस्व रहा | आधुनिकतावाद तथा दलित विमर्श मराठी लघु पत्रिका आन्दोलन के
मुख्य आधार थे | छठे दशक के मध्य में दिलीप
चित्रे, अरुण कोलाटकर, रमेश समर्थ ने मिलकर Cyclostyled Shabda ( Literally ‘word’ or ‘Speech’) नामक पत्रिका निकाली | 1960 तक यह पत्रिका अनियमित रूप से छपती रही लेकिन इस पत्रिका ने
मराठी साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया | सन् 1960 में ‘वाचा’ नामक पत्रिका के द्वारा
मराठी लघु पत्रिका आन्दोलन का प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से बढ़ा |
हिंदी में लघु पत्रिका
आन्दोलन का प्राम्भ एवं वर्तमान में पत्रिकाओं का स्वरुप -
हिंदी में लघु पत्रिका
आन्दोलन मुख्य रूप से 60 व 70 के दशक में आरम्भ हुआ | इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के अनेक मत हैं | वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय के अनुसार स्वतंत्रता के बाद
हिंदी की प्रथम लघु पत्रिका का दर्जा (जिससे हिंदी में लघु पत्रिका आन्दोलन की शुरुआत हुई) विष्णुचन्द्र की पत्रिका ‘कवि’ को देना चाहिए जो बनारस से सन् 1957 में प्रकाशित हुई थी | वहीँ दूसरी ओर ‘युवा’ के सम्पादक उद्भ्रांत का कहना है कि हिंदी में ‘लघु पत्रिका’ शब्द का प्रथम प्रयोग मार्कण्डेय
के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘कथा’ (1968) में हुआ था | इसके आगे उद्भ्रांत कहते हैं कि मार्कंडेय वैचारिक रूप
से वामपंथी विचारधारा से सम्बद्ध थे लेकिन उन्होनें अपनी पत्रिका में लोहियावादी
विचारों से परहेज़ नहीं किया |7. भले ही हिंदी में लघु पत्रिका आन्दोलन की शुरुआत को लेकर अनेक मत हों लेकिन यह
स्पष्ट है कि सन् 60 एवं 70 के दशक में प्रगतिशील एवं जनवादी पत्रिकाओं ने लघु
पत्रिकाओं के आन्दोलन को एक मज़बूत आधार प्रदान किया था | इन पत्रिकाओं में प्रमुख रूप से उत्तरार्द्ध (सब्यसाची, वृजेन्द्र कौशिक- 1972),
पहल (ज्ञानरंजन-1974/75) , युग-परिबोध (रमेश उपाध्याय,आनंद प्रकाश), कथा (मार्कन्डेय) , युवा (उद्भ्रांत-1974 –77) , वाम (चन्द्रभूषण तिवारी), परिपत्र (कौशल किशोर) , कथन (रमेश उपाध्याय), समारंभ (भैरव प्रसाद गुप्त), विकल्प (शैलेश मटियानी) शामिल थीं | जिन्होनें रंगीन पत्रिकाओं को साहित्यिक दृष्टि से परास्त
कर दिया था |
हिंदी में लघु पत्रिका
आन्दोलन भी व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में ही चला | व्यावसायिक पत्रिका की बनी बनायी परिपाटी को तोड़ने के
उद्देश्य से लघु पत्रिकाएँ निकाली गयीं जिसके कारण नए –नए लेखक एवं विचार सामने आये | लेकिन धीरे-धीरे लघु पत्रिकाओं का स्वरुप भी बदलने लगा | शुरूआती दौर के दस वर्षों के बाद लघु पत्रिकाओं का स्वरुप परिवर्तित
होने लगा था | नए रचनाकारों का उत्पादन थोक
में हो रहा था | लेकिन अफ़सोस इस बात का था कि
वह साहित्य में प्रतिष्ठित होने के लिए रचना कर रहे थे न कि साहित्य को समृद्ध
करने के लिए | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने
ऐसे ही सम्पादकों और लेखकों की खबर लेते हुए लिखा है-कलम पकड़ते ही हिंदी का नया लेखक साहित्य में प्रतिष्ठित हो
जाना चाहता है और वे सभी नुस्खे अपनाता है जो हर चलती दुकान पर उसे मिलते हैं | इनमें एक है लघु पत्रिका निकालना | चार मित्रों को साथ लिया और एक छोटी सी साहित्यिक कही जाने
वाली पत्रिका निकाल दी | ...........शीघ्र प्रतिष्ठा की आकांक्षा
के कारण प्रतिष्ठित साहित्यकारों के पीछे भागना – उसकी बैसाखी लगा कर स्वयं को चलाना, सस्ती नारेबाजी करना..........इन पत्रिकाओं के कारण साधारण पाठक की नवलेखन पर बनती हुई
आस्था भी टूटती है |” सर्वेश्वर जी के इस कथन से
स्पष्ट है कि अधिकतर लघु पत्रिकाएँ बिना किसी उद्देश्य एवं विचार के निकल रही थीं |
ज़ाहिर सी बात है कि लघु
पत्रिका निकालने का ये अर्थ बिलकुल नहीं था कि आप साहित्य के नाम पर कुछ भी छापें | एक विशेष उद्देश्य के तहत ही किसी पत्रिका को स्थापित किया
जा सकता है | और जब पत्रिका अपने उस
उद्देश्य से भटकने लगती है तो फिर केवल मजबूरी और औपचारिकता जैसी चीजें उसके साथ
जुड़ने लगती हैं | ऐसा ही हाल ‘हंस’ पत्रिका का भी हुआ | हालाकि आज भी ‘हंस’ एक वैचारिक पत्रिका की श्रेणी में जोड़ी जाती है लेकिन अब इसे लघु पत्रिका की
श्रेणी में कतई नहीं रखा जा सकता | प्रेमचंद के समय में ये अवश्य ही लघु पत्रिका के अंतर्गत आती थी जबकि उस समय
पत्रिकाओं की ऐसी कोई श्रेणी हिंदी में तो नहीं बनी थी लेकिन ‘हंस’ का उस समय स्वरुप वैसा ही था | इसके बाद राजेन्द्र यादव ने सन् 1985 में ‘हंस’ को दुबारा निकालना प्रारंभ किया तब हिंदी में एक नए युग की
शुरुआत हुई – स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसे मुद्दों को उठाया गया एवं धीरे –धीरे ये ये मुद्दे हिंदी साहित्य का अंग बन गए | दूसरे शब्दों में कहें तो साहित्यिक क्रांति की शुरुआत हुई ‘हंस’ के द्वारा | लेकिन धीरे-धीरे ‘हंस’ का भी स्वरुप बदलता हुआ दिखाई
देता है | सन् 2000 के बाद हंस के जीतने भी स्त्री विशेषांक निकले उन सभी
विशेषांकों के द्वारा केवल ‘स्त्री’ को भुनाने की कोशिश की गयी | ‘हंस’ का एक विशेषांक ‘भूमंडलीकरण और पितृसत्ता के नए रूप’ में आवरण पृष्ठ को देखते ही ये मालूम हो जाता है कि जिस
शारीरिक स्वतंत्रता की ‘हंस’ बात करता है, भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री के शरीर को एक उत्पाद की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, इसकी घोषणा करता है - उसी ‘स्त्री’ को अपनी पत्रिका के आवरण
पृष्ठ पर उत्पाद की तरह ही इस्तेमाल करता है | ‘हंस’ जैसी क्रांतिकारी पत्रिका जब अपने ध्येय को त्याग कर व्यावसायिक
पत्रिकाओं की श्रेणी में नज़र आने लगती है तो दूसरी पत्रिकाओं का कहना ही क्या ?
स्पष्ट है कि केवल नाम से ही
कोई पत्रिका ‘लघु पत्रिका’ की श्रेणी में नहीं आएगी | लघु-पत्रिकाओं का एक मात्र उद्देश्य है समाज और साहित्य को सच से अवगत करवाना | आज कुछ ऐसी पत्रिकाएं हैं जो व्यावसायिकता के पीछे नहीं भाग
रही हैं और साहित्य को समृद्ध बनाने में अपना पूर्ण योगदान दे रही हैं लेकिन
अधिकतर लघु –पत्रिकाएँ व्यावसायिक बन चुकी
हैं उनका स्वरुप अवश्य छोटी पत्रिकाओं जैसा है लेकिन उनका लक्ष्य केवल सहित्य में
प्रतिष्ठित होना है | इसलिए ज़रूरत है कि हिंदी में
जितनी भी लघु पत्रिकाएँ निकल रही हैं वे सभी एक नए सिरे से अपने पत्रिका के विचार
एवं लक्ष्य को फिर परिभाषित करें और उस एक
नया आयाम प्रदान करें जो हिंदी साहित्य व समाज के लिए लाभदायक हो |
सन्दर्भ :-
- लेख- राजीव रंजन गिरी, लघु पत्रिका आन्दोलन : संरचना और सरोकार, हिंदी समय, ई-वेब जर्नल
- शोध प्रबंध – संध्या चौधरी, हिंदी लघु पत्रिका आन्दोलन ( सन्1960 से 1980 तक ), 1985, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय,दिल्ली
- लेख- राजीव रंजन गिरी, लघु पत्रिका आन्दोलन : संरचना और संस्कार, हिंदी समय, ई-वेब जर्नल
- लेख – धर्मवीर भारती, छोटी पत्रिकाएँ, बड़ी पत्रिकाएँ और साहित्यिक संस्कार, धर्मवीर रचनावली, राजकमल प्रकाशन |
- लेख- राजीव रंजन गिरी, लघु पत्रिका आन्दोलन : संरचना और संस्कार, हिंदी समय, ई-वेब जर्नल
- लेख- राजीव रंजन गिरी, लघु पत्रिका आन्दोलन : संरचना और संस्कार, हिंदी समय, ई-वेब जर्नल
- संध्या चौधरी, हिंदी लघु पत्रिका आन्दोलन ( सन्1960 से 1980 तक ),1985, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय,दिल्ली |
- जॉन .एल. कूपर, दी रोल ऑफ़ लिटिल मैगज़ीन
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, लघु पत्रिकाएँ : महत्त्वपूर्ण आकांक्षाएं, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ग्रंथावली |
- लिटिल मैगज़ीन मूवमेंट, विकिपीडिया
- लिटिल मैगज़ीन मूवमेंट इन बंगाल, विकीपीडिया
- उद्भ्रांत, लघु पत्रिका आन्दोलन में युवा की भूमिका, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2009.
- लघु पत्रिका एवं साहित्यिक पत्रकारिता, धर्मेन्द्र गुप्त, तक्षशिला प्रकाशन, दिल्ली, 2000.
- निकिता जैन,अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में पीएचडी शोधार्थी,सम्पर्क:9953058803,nkjn989@gmail.com
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