शोध आलेख
: प्रो.श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कविता का दलित स्वर
- अनुज
कुमार
शोध सार : हिंदी दलित कविता के क्षेत्र में प्रो. श्यौराज
सिंह ‘बेचैन’ का विशिष्ट स्थान है।
उनकी कविताओं में दलित समाज का सच पूरी ईमानदारी के साथ उद्घाटित होता है जिसमें
दलित समाज के उत्पीड़न, शोषण, अभावों से
उपजे जीवन संघर्ष, जाति आधारित भेदभाव के बदलते स्वरूप आदि
को यथार्थ अभिव्यक्ति मिली है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में मानवविरोधी मूल्यों
का नकार और उनके स्थान पर मानवोचित मूल्यों की पक्षधरता का स्वर साफ सुनाई देता
है। इस प्रकार उनकी कविता मानवीय गुणों की संवाहक बन पड़ी है। वह मानवविरोधी उन
तमाम मान्यताओं का खंडन करती है जोमनुष्य को जन्म आधारित ऊंच-नीच के षड्यंत्र में
जकड़ देती हैं। जिसके चलते उसे जीवन भर पीड़ा, यातनाऔर दुखों को झेलना पड़ता
है।वर्णव्यवस्था जैसी अवैज्ञानिक अवधारणाओं को वह जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है जो
कि मानव को जातीय संकीर्णता में उलझाकर उसके शोषण को न्यायसंगत ठहराती है। वह इस
व्यवस्था की मानसिक निर्मित के स्त्रोत ग्रंथों का ध्वंस कर समता, स्वतंत्रता और
बंधुता से लैस नव समाज का सृजन करना चाहती हैजिसके केंद्र में मानवता हो। इस
दृष्टि से श्यौराज सिंह बेचैन की कविताओं को देखा जा सकता है।
बीज शब्द : वर्णव्यवस्था का खंडन,दलित
चेतना, विद्रोही स्वर, स्त्री, धार्मिक अंधविश्वास और असमानता
का प्रतिरोध,मानवीय मूल्य और समता,
वंश-परंपरा, लोकतन्त्र।
मूल आलेख : हिंदी
दलित कविता का उदय भारतीय समाज की विषमतावादी व्यवस्था अर्थात् वर्णव्यवस्था से
हुआ है। जिसने दलित समाज को दास बनाकर उन्हें हाशिए पर धकेल दिया और मानवीय
अधिकारों से वंचित कर उनका शोषण किया। दलित की अवधारणा के केंद्र में दासता है। इस
दासता के अनेक रूप हैं। इस दासता का बोध ही दलित कविता का मूल स्वर है। रमणिका गुप्ता
ने दलित की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा है-"दासता ही दलित अवधारणा की जननी है। यह दासता
उसकी पराजय के कारण हो या उसके रंग के कारण अथवा जन्म, जाति या
कबीलों के स्वर की भिन्नता के कारण, इसका साथ विकास होता चला
गया। दासता की मानसिकता के विकास के साथ-साथ समानता और सामूहिकता
समाप्त होती गई। वे सैनिक के रूप में राजा के, भक्त के रूप में
भगवान के, अनुयायी के रूप में धर्म के और शिष्य के रूप में गुरु
के दास बन गए।"1 इस
दृष्टि से प्रो॰ श्यौराज सिंह ‘बेचैन’
की कविताएं शोषण मुक्त समाज की पैरवी करते हुए मानवता विरोधी युद्ध को नकारती हैं।
साथ ही समसामयिक समय में व्याप्त चाटुकारिता जैसी नकारात्मक प्रवृति के निषेध की
मांग करती हैं जो कि किसी भी समाज के विकास के मार्ग को अवरुद्ध करती है।
“शेष रही दासताओं
की समाप्ति के बाद
भावों के विहंग
मुक्त नभ में
उड़ाएंगे।
सत्य को असत्य कहें,
यह कदापि होगा नहीं,
रात यदि रात है
तो रात ही बताएँगे।
यह कि हम किसी,
चाटुकारिता तो हम
कर नही पाएंगे।
मानवास्तित्व से
सुहागिनी रहे धारा
मानव विरुद्ध
कोई युद्ध नहीं
चाहेंगे।”2
कवि 'बेचैन' डॉ. भीमराव आंबेडकर
की वैचारिकी से प्रेरणा ग्रहण कर सृजन करते हैं। डॉ. आंबेडकर एक ऐसे समाज का
निर्माण करना चाहते थे जिसमें वर्ण,जाति और लिंग से उपजी
ऊंच-नीच, छुआछूत आदि के लिए कोई स्थान न हो। उनके लिए मानव
की स्वतन्त्रता का मूल्य सर्वोपरि था। स्वतन्त्रता बाधित करने वाली व्यवस्था, फिर चाहे वह जाति आधारित हो या लिंग आधारित या अर्थाभाव आधारित हो को
नकारा है। डॉ॰ आंबेडकर की चिंता के केंद्र में जाति का उन्मूलन था उनके अनुसार "अब एक मात्र विचारणीय प्रश्न यह रह जाता है : हिंदू समाज
व्यवस्था में सुधार कैसे लाया जाए ? जाति का विनाश कैसे किया
जाए ? जाति में सुधार को लेकर एक दृष्टिकोण यह है कि इस दशा में
उप-जातियों को समाप्त करना सबसे पहला कदम होना चाहिए।"3 स्त्रियों के उत्पीड़न का भी लंबा इतिहास रहा
है। सीता को भी अपनी पवित्रता प्रमाणित करने हेतु अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा था।
समाज के दोहरे मानदंडों का और स्त्री जीवन की सच्चाई को कवि ने अपनी कविता ‘औरत की गुलामी’ में कुछ इस प्रकार पिरोया है-
“कभी अग्नि परीक्षा
में-
औरत ही तो बैठी थी।
होती थी जब सती तो-
औरत ही तो होती थी।
उसी जुल्म की
बकाया-
पर्दा भी निशानी है
औरत की गुलामी भी-
एक लंबी कहानी है।”4
कवि का मानना है कि गुलामी की बेड़ियों को यदि तोड़ना है तो उसके लिए स्वयं
प्रयास करना होगा। स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करते हुए कवि बेचैन घोषणा
करते हैं-
“अब वक्त है वो
अपने-
आयाम खुद बनाए।
तालीम हो या सर्विस-
अपने हकूक पाए।”5
भारतीय समाज में व्याप्त जातीय शोषण से कौन परिचित नहीं है। आए दिन
अखबारों में दबंग जातियों द्वारा दलितों के शोषण की खबरें छपती रहती हैं। जिसमें
जिंदा जला देना, दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार आदि प्रमुख
हैं। कवि को ये घटनाएँ व्यथित करती हैं।
प्रो. श्यौराज सिंह 'बेचैन' की कविता 'इकतारा' दलित समाज में स्वाभिमान की भावना को जाग्रत करने का प्रयास करती है। इस कविता
में 'इकतारा' प्रतीक रूप में आया है। यह इकतारा उस बुद्धि संपन्न, तर्कशील, सजग और चेतना युक्त
व्यक्ति का प्रतीक है जो शिक्षित होने के साथ ही अपने शोषण के तंत्र से भलीभांति
परिचित ही नहीं अपितु उस शोषण के तंत्र को समाप्त करने के लिए निरंतर संघर्षशील भी
है। यह 'इकतारा' अपने पूरे दायित्व के साथ दलित जीवन के प्रश्नों को उठाते हुए उस मानसिकता पर
चोट करता है जो दलित समाज के श्रम को हीन दृष्टि से देखकर अपनी नाक सिकोड़ लेता है
किंतु कवि को अपने श्रम पर गर्व है।
“तुन-तुन तुन-तुन
तुनन-तुना तुन
बोल रहा है एक तारा...
......
जन्म हुआ उस घर में मेरा
श्रम सेवा कर जीता है
मैं कहता हूं गौरव है यह
द्वि जन कहें नीचता है।”6
दलित समाज के शोषण का कारण जाति व्यवस्था को ईश्वर द्वारा
निर्मित व्यवस्था के रूप में सिद्ध करना रहा है क्योंकि मनुष्य की बुद्धि पर जब
ईश्वरीय खोल चढ़ा दिया जाता है तो उसकी चेतना दब जाती है। मनुष्य की चेतना का दबना
ईश्वर द्वारा निर्मित व्यवस्था को बिना किसी संशय और प्रश्न के स्वीकार करना होता
है और इस व्यवस्था के प्रति विरोध को दबाने का सबसे सश्क्त हथियार है पूर्व जन्म
की अवधारणा। यह एक ऐसी अवधारणा है जो व्यक्ति को अपनी जाति के नीचे या ऊंचे होने
का बोध निरंतर कराती रहती है क्योंकि इस अवैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार ही व्यक्ति
का जन्म पिछले जन्म के कर्मों के आधार पर ही विशेष जाति में होता है। यह अवधारणा
भी मनुष्य की चेतना पर प्रहार कर उसे भाग्यवादी बना देती है। साथ ही अपनी जाति के
प्रति हीनता ग्रंथि को प्रश्रय देती है जिसे ऊर्जा समाज के उस तथाकथित वर्ग से
मिलती है जो स्वयं को उच्चता के दंभ से सुशोभित करते हैं। ‘बेचैन’ जी अपनी कविता 'मन की मार' में दलित समाज को
फटकार ही नहीं लगाते अपितु स्वयं को किसी जाति से छोटा समझने की जो मनोवृत्ति है
उससे उबारने का प्रयास भी करते हैं-
"कोई कारण नहीं
कि वह तुम्हें-
अछूत कहता
और
तुम सिर नीचा कर उसे स्वीकारते
उसने तुम्हें चमार कहा-
और तुम हो गए अधमरे ?
भंगी कहा तो-
पैरों में ही जा गिरे
अपमानित से"(7)
अछूत और हरिजन शब्द में जहां गांधीवादी विचारधारा का स्वर है जिसमें
अधिकारों की मांग याचना पर निर्भर है वहीं दलित शब्द में अंबेडकरी विचारधारा की
हुंकार है जिसमें अधिकारों की मांग संघर्ष पर निर्भर है। जहां हृदय परिवर्तन के
स्थान पर अधिकार की चेतना की खनखनाहट है। हिंदी दलित कविता को ऊर्जा अंबेड़करी
विचारधारा से मिलती है। प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन की कविता इसी चेतना की संवाहक बन
पड़ी है और जो संविधान छुआछूत को अपराध की श्रेणी में रखकर दंड का प्रावधान करता है, उस कानून का स्वागत करती है-
"राजपुरोहित ही था माहिर,
उल्टा पाठ पढ़ाने
में।।
गौरव था भाई-भाई को,
छूत-अछूत बताने
में।
स्वागत संविधान का
जिसने
दूर किया झंझट
सारा।।"8
चातुर्वर्ण द्वारा स्थापित मानव विरोधी अन्यायकारी मूल्यों
के स्थान पर समतामूलक समाज का निर्माण करना ही हिंदी दलित कविता का मूल उद्देश्य
है। भाग्य और भगवान का सहारा लेकर व्यक्ति को तर्कहीन बनाने का षड्यंत्र हिंदू
धर्म ग्रंथों में रचा गया जिसके चलते एक बहुत बड़े वर्ग को अछूत घोषित कर उसका शोषण
किया गया। हिंदी दलित कविता उन तमाम अमानवीय पंरपराओं को नकार कर पाखंडी समाज की
मानसिकता का बहिष्कार करती है। साथ ही समतामूलक समाज की नींव रखने का प्रयास करती
है। इस प्रकार “दलित कविता में समाज की वर्ण व्यवस्था को थर्रा
देने वाला कंपन है, शोषण की बर्फ को पिघलाकर नदी बहा देने
वाली गर्मी है और वर्ण और वर्ग की नींव को ध्वस्त कर एक समतामूलक समाज की एक नई
इमारत खड़ी करने वाली वास्तुकला है।”9 सवर्ण समाज जहां मानता है कि
वर्णव्यवस्था समाज को संचालित करने हेतु श्रेष्ठ व्यवस्था है वहीं दलित कवि
श्यौराज सिंह बेचैन के लिए यह व्यवस्था क्रूरता का पर्याय है-
“क्रूरता है जिसका किरदार,
विषमतावादी वर्ण समाज।”10
द्विजों द्वारा लिखी गई ज्यादातर कविताओं में प्रकृति प्रेम, रोमानियत, अतीत का गौरव गान, ईश्वर भक्ति आदि का
वर्णन मिलता है वहीं दलितों द्वारा लिखी गई कविताओं में दलित समाज की पीड़ा, व्यथा, तकलीफ एवं शोषण का
स्वर अधिक सुनाई देता है। इस प्रकार दलित कविता का यथार्थ अनुभव जनित यथार्थ है और
इस अनुभव जनित यथार्थ में दलित चेतना के स्पष्ट दर्शन होते हैं। दलित चेतना के
संदर्भ में ओम प्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं- “दलित की दुख, पीड़ा, शोषण, व्यथा
का विवरण देना या बखान करना ही दलित चेतना नहीं है या दलित पीड़ा का भावुक और अश्रु
विगलित वर्णन जो मौलिक चेतना से विहीन हो, चेतना का सीधा
संबंध दृष्टि से होता है जो दलितों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक भूमिका की छवि के तिलिस्म को तोड़ती है, वह
है दलित चेतना।”11 इस चेतना में शोषण के षड्यंत्र का बोध है। जो उन्हें
जागरूकता प्रदान करता है। यह जागरूकता ही उसे जाति की बेडियों को तोड़ने की प्रेरणा
देती है और जो इन बेड़ियों को मजबूती प्रदान करने का प्रयास करते हैं| दलित कवि
श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ उनके षड्यंत्र का
पर्दाफाश अपनी कविता 'लगता जिंदा पर मरा हुआ' में कुछ इस प्रकार करते हैं-
"आग छीन ली है
चूल्हे की
दाल-भात हांडी का भी
सिर से छत गायब कर दी है
तन से कपड़ा लत्ता भी।"12
इतना सब होने पर भी जब दलित समाज चुप्पी साधे बैठा है। उस पर कवि की वाणी
में कुछ तीखापन भर जाता है और वह आक्रोशित होकर कहता है-
"युगों युगों की
सहनशीलता,
औ, संयम से भरा हुआ।
भारत का यह कौन वर्ग,
लगता जिंदा पर मरा हुआ।"13
धर्म और ईश्वर के नाम पर जातिगत ऊंच-नीच को न्याय संगत
ठहराने वाली समाज की मानसिकता की बुद्धिसंगत आलोचना करना जरूरी है जो कि आदि काल
में सिद्धों ने, भक्तिकाल में संत कवियों ने और आधुनिक काल में ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, पेरियार जैसे
विचारकों ने की। जिसका प्रभाव स्पष्ट रूप से हिंदी दलित कवियों पर भी पड़ा है।
धर्म, जन्म पर आधारित
सामाजिक विभाजन को न्यायोचित ठहराने का ऐसा षडयंत्र रचता है जिसमें शोषण भी
स्वाभाविक जान पड़ता है। ईश्वरीय विधान का उलाहना देकर जाति विशेष में पैदा होने का
तर्क पूर्व जन्म में किए गए कर्मों को बताया जाता है जिसका कोई आधार नहीं है।
जातीय अहंकार की निर्मिति वंश परपंरा जैसी अवधारणाओं पर होती है। परंपरा ऐसी
निरंतरता पैदा करती है जिसमें जाति विशेष में पैदा होने वाला व्यक्ति अपने पिता का
मिथकीय गौरव प्राप्त कर लेता है क्योंकि जाति से जुड़ी हुई सीढ़िनुमा मानसिकता का
निर्माण धार्मिक ग्रंथों की बिना सिर पैर
की कहानियों के माध्यम से बहुत गहरी उतार दी गई हैं। उदाहरण के रूप में ब्राह्मण जाति श्रेष्ठता का पर्याय मानी जाती
है और उसमें पैदा होने वाला नकारा भी श्रेष्ठ माना जाता है किंतु उसकी श्रेष्ठता
वंश पर आधारित है। वंश का विचार इसी तर्क पर आश्रित है जो कि अपने आने वाली
पीढ़ियों को सामाजिक व्यवस्था में श्रेष्ठ साबित कराती है किंतु दलित कवि जन्म
आधारित श्रेष्ठता को नकारता है। 'अचंभा' नामक कविता में ‘बेचैन’ जी कहते हैं-
"प्रतिभा-गुण
जन्मना नहीं
किसी धन्ना सेठ
या किसी जाति विशेष
की-
बपौती तो बिल्कुल
नहीं।"14
विषमतापूर्ण
वर्णव्यवस्था के चलते जन्म से होने वाले भेदभाव के कारण न जाने कितनी प्रतिभाएं
अपना दम तोड़ देती हैं जिससे देश की क्षति होती है। इस पर कवि सवर्ण समाज की
मानसिकता पर चोट करते हुए उनसे प्रश्नन पूछता है-
"क्या हम कभी
जन्म भेद से होने
वाली
देश की क्षति का
आकलन करते हैं,
हिसाब लगाते हैं ?"15
सही मायने में देखा जाए तो हिंदी दलित कविता चातुर्वर्णीय
परंपरा की आलोचक है। वह इस मानसिकता का बदलाव रचती है और मानवता को केंद्र में
रखकर समानता के भाव की पैरवी करती है। जिसका प्रतिबिंब श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कविताओं में नजर आता है।
‘बेचैन’ जी साहित्य में
लोकतन्त्र की बात करते हुए वैचारिक विविधता के स्वीकार की पैरवी करते हैं। उनका
मानना है- “लोकतान्त्रिक प्रणाली में वैचरिक विविधता की बहुलता, ज्ञान व्यवस्था के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाती है।”16
किन्तु परंपरावादी सवर्ण मानसिकता साहित्य में वैचारिक विविधता को नकारने का
प्रयास करती है।
श्यौराज
सिंह 'बेचैन' की कविताओं में निहित संवेदना का विकास समाज में होने वाले दलितों के शोषण और
उत्पीड़न का परिणाम है। इस उत्पीड़न को कवि की आत्मा ने स्वयं भोगा है। प्रमाणस्वरूप
उनकी आत्मकथा 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर' को देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी कविताओं में जो प्रश्न उठाए
हैं वे अब तक अनुत्तरित हैं। सवर्ण समाज की जातीय मानसिकता भी उन प्रश्नों के
उत्तर नहीं दे पायी है। वह मात्र ऊपरी मन से जातिव्यवस्था का विरोधी है। जातीय
श्रेष्ठता के मोह से वह अब भी मुक्त नहीं हो पाया है। ‘बेचैन’ जी समतामूलक समाज के पक्षधर हैं।
दलित विचारकों के संदर्भ में डॉ॰ रजत रानी
मीनू की यह टिप्पणी सटीक जान पड़ती है- “वर्णभेद, जातिभेद और
धार्मिक असमानता बोधक स्थितियों को समाप्त कर समतामूलक स्वस्थ मानवी समाज बनाना
दलित विचारकों का महान लक्ष्य रहा है।”17 कवि स्वयं छात्रों, दलितों, मजदूरों, किसानों आदि के
संगठन में रहे हैं इसलिए बखूबी उनकी अच्छाईयों, बुराईयों, स्वार्थ लोलुपता और संकीर्ण मानसिकता से भलीभांति परिचित हैं।उनकी इस
यथास्थिति का उद्घाटन उन्होंने अपनी कविता 'यथावत' में किया है-
"वर्ण मुक्त
जाति विहीन
समाज बनाने पर
करते हैं बहसें ओर
घर लौट कर
ब्राह्मण-ब्राह्मण
कायस्थ-कायस्थ
अछूत-अछूत बने रहते हैं।"18
निष्कर्ष : साहित्य जीवन की अभिव्यक्ति है और जब-जब साहित्य में जीवन की
सच्चाई को प्रकट किया जाता है तो उसमें एक ताजगी बनी रहती है। साहित्य में चलने
वाले 'वाद' की सार्थकता तभी तक है जब तक उसमें
जीवन की चेतना का संचार है। जब उसमें जीवन की चेतना को प्रवाहित करने की क्षमता
नहीं रहती तब वह जड़ हो जाता है और उसकी सार्थकता भी समाप्त हो जाती है। दलित
साहित्य दलितों द्वारा लिखा गया ऐसा साहित्य है जिसमें लेखक अपने लेखन की सामग्री
को अपनी वास्तविक स्थितियों से एकत्रित करता है। दलित जीवन का सच्च उसमें
प्रतिबिंबित होता है। उसमें बनावटीपन के लिए जगह नहीं है। परंपरागत साहित्य में
उपेक्षित पात्र अब लेखक बन स्वयं अपने समाज का सच सामने ला रहे हैं। यह साहित्य
में उठे अस्मिता विमर्शों का ही परिणाम है। इस संदर्भ में प्रो॰ करुणाशंकर
उपाध्याय ने बड़ी ही सटीक टिप्पणी की है- “अस्मिता विमर्शों के कारण हमारे परंपरागत
साहित्य रामायण, महाभारत के वे उपेक्षित पात्र जो दलित, आदिवासी नाम से जाने जाते थे, विमर्श के रूप में अब
लेखक बन कर लिखने लगे हैं। यह भारत का बदलता हुआ परिदृश्य है।”19
प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन की कविताएं एक सच्चे याथार्थवादी कवि की कविताएं
हैं। जिसकी सामग्री का संकलन वास्तविक स्थितियों से किया गया है। साथ ही कविताओं
में जो क्रांति की भावना का स्वर सुनाई देता है। उसके पीछे उनके स्वयं का जीवन है जो कि उन
परिस्थितियों का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व करता है जो उनकी आत्मा ने भोगा है। अत:
दलित समाज के अभाव और उसकी परिस्थिति का चित्रण करते हुए, उस समाज को शोषण के
तंत्र से अवगत कर उसमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना जाग्रत करना उनका लक्ष्य रहा
है।
संदर्भ :
1. गुप्ता, रमणिका (सं.), दलित कहानी संचयन,
साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली, संस्करण-2003, पृ.6
2.'बेचैन', श्यौराज सिंह,
क्रौंच हूँ मैं (काव्य-संग्रह), सहयोग प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण. 1995,
पृ.22
3.आंबेडकर, भीमराव, जाति का विनाश,
अनुवादक- राजकिशोर, फारवर्डप्रेस,
नईदिल्ली, संस्करण-2018, पृ.97
4.'बेचैन', श्यौराज सिंह, नई फसल कुछ अन्य कविताएं (काव्य-संग्रह),
वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2014,
पृ.112
5.वही, पृ.113
6.'बेचैन', श्यौराज सिंह, चमार की चाय (काव्य
संग्रह), वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2017, पृ. 41
7. वही, पृ. 172
8.वही, पृ. 55
9. चतुर्वेदी, डॉ. रमेशचंद्र , बीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता, साहित्य संसथान गाजियाबाद, सं.
2019, प्राक्कथन, पृ.14
10.'बेचैन', श्यौराज सिंह, भोर के अंधेरे में, प्रथम संस्करण 2018, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.56
11. वाल्मीकि, ओम प्रकाश, दलित साहित्य का
सौंदर्यशास्त्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, प.सं. 2001, पृ.
29
12.'बेचैन', श्यौराज सिंह, चमार की चाय (काव्य संग्रह), वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2017, पृ. 108
13.वही, पृ. 108
14.'बेचैन', श्यौराज सिंह, भोर के अंधेरे में, प्रथम संस्करण 2018, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.57
15.वही, पृ. 58
16.'बेचैन', श्यौराज सिंह, उत्तर सदी के
हिन्दी कथा-साहित्य में दलित-विमर्श,
अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, प्रथम संस्करण, 2014, पृ. 46
17.मीनू, डॉ॰ रजत रानी, नवें दशक की हिन्दी दलित
कविता, दलित साहित्य प्रकाशन संस्था,
प्रथम संस्करण, 1996, पृ. 78
18.वही, पृ. 98
19. मीनू, डॉ॰ रजत रानी, लेख- बदलते हुए परिदृश्य में दलित लेखकों की स्त्री केन्द्रित कविता,(बहुरि नहीं आवना),जनवरी,
2021-जून,2021, पृष्ठ-29
अनुज कुमार शोधार्थी(पीएच॰ डी॰)
हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
anujk401@gmali.com, 7982232667
अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-39, जनवरी-मार्च 2022
UGC Care Listed Issue चित्रांकन : संत कुमार (श्री गंगानगर )
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